सम्भलकर करना , "इश्क" ऐ दिल !
मोहब्बत में अक्सर हुश्न ,
दगा बाज़ हुआ करते है ।
बिरले ही होते है कोई समां जो ,
परवाने संग बुझ जाया करते है ।
वरना देखा है अक्सर , समां ही ।
परवाने को जलाकर , इठलाया करते है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
सम्भलकर करना , "इश्क" ऐ दिल !
मोहब्बत में अक्सर हुश्न ,
दगा बाज़ हुआ करते है ।
बिरले ही होते है कोई समां जो ,
परवाने संग बुझ जाया करते है ।
वरना देखा है अक्सर , समां ही ।
परवाने को जलाकर , इठलाया करते है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें