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लॉक डाउन/ कोरोना काल गरीबों की व्यथा ।

बे - रोजगार बे घर , 

फाका की आ गयी है नौबत ।

बंद है बाजार , जेब खाली है ।

घर जाए भी तो कैसे , 

बंद है बस -गाड़ी । 

कुछ समझ नही आता ,

विकट संकट की ,

कैसी आ गयी यह घड़ी है ।

कोरोना तूने गरीबो को ,

कहीं का नही छोड़ा है । 

तू आये भी मुझ पर तब भी , 

न आये तब भी , 

मुझे तो हर हाल में ही रोना है । 

आसमान है छत मेरी , 

धरा मेरा बिछोना है ।

आंसूओ से क्या बुझेगी , प्यास मेरी । 

आशाओं से , क्या भूख मिटेगी । 

प्रभु तेरे जग में अभिशाप ही , 

गरीबों का होना है ।

कोरोना तूने गरीबो को , 

कहीं का नही छोड़ा है । 

तू आये भी मुझ पर तब भी , 

न आये तब भी , 

मुझे हर हाल में ही रोना है ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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