मिलती नही जमीं सबको ,
न आसमां ही ।
ये तो नसीब है अपना-अपना ,
कोई तो महलों में है अकेला।
कोई फूस में और , किसी का घर है ,
खुला आसमां ही ।
सजती है किसी महफिलें,
रास-रंगरलियों में ।
गम और खुशियों में ,
डूब जाता है कोई ,
शराब की पियालियों में ।
कोई भटक रहा होता है ,
फाटे- हाल ,
भूखा प्यासा उन्हीं की ,
रंगीन गलियों में ।
धूप हो या छाव मिलती है ,
हर किसी को , अपने ही नशीबों से ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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