गुजरता हूँ अब भी मैं , उन राहों से ।
जहां हमकदम बन कर ,चले थे
तुम संग कभी ।
शायद मिल जाये वो निशाँ ,
हमारी मोहब्बत के ।
हाँ मौजूद है वो डाली आम की,
जिसकी छांव में ,
वक्त गुजारा करते थे हम कभी ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
गुजरता हूँ अब भी मैं , उन राहों से ।
जहां हमकदम बन कर ,चले थे
तुम संग कभी ।
शायद मिल जाये वो निशाँ ,
हमारी मोहब्बत के ।
हाँ मौजूद है वो डाली आम की,
जिसकी छांव में ,
वक्त गुजारा करते थे हम कभी ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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