न पूछते तुम मेरे , राज़ ए गम तो अच्छा होता ।
बड़ी मुश्किल से तो , अभी ज़ख्म भरे ही थे ।
चुप से हो जाते सामिल , मेरी तन्हाईयाँ में तो,
अच्छा होता ।
लो फिर शुरू हो गया दिल का सिसकना ,
सुर्ख आंखों में शबनम का पिघलना ।
यूँ ही समझ लेते मेरे , हाल ए दिल तो अच्छा होता ।
न पूछते तुम मेरे , राज़ ए गम तो अच्छा होता ।
ऐसा नही कि गम ए दरिया से , गुजना नही आता हमें ।
देता गर वो साथी साथ मेरा तो , इस गम ए हाल से ,
हम पार हो जाते ।
चलो सकून है मुझे , अपनी इस दिल की तन्हाईयो में ।
मिलती जो हर खुशी तो, तेरा साथ फिर कहाँ पाते ।
न पूछते तुम मेरे राज़ ए गम तो अच्छा होता ।
चुप से हो जाते सामिल मेरी तन्हाईयाँ ,
में तो अच्छा होता ।
✍️ज्योति प्रयास रतूड़ी
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