सदियाँ गुजर गई , तू आयी और चली गयी ।
कभी कुछ पल ,कभी पूरी हुई ।
ऐ जिंदगी ! तू कब किसी हुई ।
मिथ्या स्वप्न दिखा कर , भ्रम ये तेरा मेरा का देकर ।
काम क्रोध मोह लालच का , ऐनक पहना कर ।
सूट बूट और फटे हाल में ,इतराकर मचला कर ।
दुख-सुख के , आंसुओं में नहा कर ।
हट बचपन ठाठ यौवन , वृद्धा लाचार हुई ।
ऐ जिंदगी ! तू कब किसकी हुई ।
सदियाँ गुजर गई , तू आयी और चली गयी ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें