बात कुछ तो ऐसी भी नही थी .....मगर दिल को बुरा सा लगा ।
जी से चाहत होती है जिससे ...ना जाने वो
ही क्यों जी चुराता है हमसे ।
मैं तो संभाल लूंगा खुद को...अपने एहसासों को कर दफन कहीं ।
इस दिल का क्या करें.....इसे तो आदत सी हो गई है ,
तुम संग रहने की ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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