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हार चुका हूं खुद से ही खुद मैं ।

हार चुका हूं ,खुद से ही खुद मैं ।
अब जीतू किसी से , तो क्यों भला ? 
आखिर इस संसार में रखा ही क्या ?

धोखा ,फरेब और जालसाज़ ,
हर तरफ है दुश्मन , 
इंसान के इंसान यहाँ ।

एक चेहरे पे कई चेहरे लिए , 
घूमते है हर कोई  यहाँ ।
पहचान मुश्किल है अब, 
कौन दोस्त है , दुश्मन कौन यहाँ ?

टूटते देखे है वफ़ा के रिश्ते , 
शक़ की आंधियों में  ।
अब वो प्यार की , पुरवाई रही कहाँ ।

हार चुका हूं ,खुद से ही खुद मैं ।
अब जीतू संसार से , तो क्यों भला ? 
आखिर इस संसार में रखा ही क्या ?
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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