यूँ ही रफ्ता रफ्ता , गुजर जाएगी जिंदगी ।
सिसकियों से भरी , किसी की याद में ।
सहारा न जाने कब तलक का , जिंदगी !
न जाने कब , साथ छोड़ चली जाएगी ।
न जाने कौन सी , करवट ले ले वक़्त ।
आ सो जायें , मस्त नींद हम ।
न जाने कब , फिर ऐसी रात आएगी ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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