आज मायूस सी है, जिंदगी ।
ऐ वक्त थोड़ा सा ही सही ,
मुझे मेरे बचपन की ,
रोशनाई लौटा दे ।
बे-सुर बे-रंग लगने लगा है ,
अब यह जहां न जाने क्यों ?
ये वक्त ! मुझे ,
हल्का सा ही सही ।
मुझे मेरी वो रंगीन महफ़िल ,
वो रुबाई लौटा दे ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
आज मायूस सी है, जिंदगी ।
ऐ वक्त थोड़ा सा ही सही ,
मुझे मेरे बचपन की ,
रोशनाई लौटा दे ।
बे-सुर बे-रंग लगने लगा है ,
अब यह जहां न जाने क्यों ?
ये वक्त ! मुझे ,
हल्का सा ही सही ।
मुझे मेरी वो रंगीन महफ़िल ,
वो रुबाई लौटा दे ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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