बने याद कोई ऐसी की ,
ये मन कभी न बुझाने पाए ।
आ बैठ पास मेरे,
ऐसा कोई समा बनाये ।
न तुम कहो कुछ हमसे,
न हम कहें तुमसे ।
और मुलाकात हो जाए ।
शब ए आलम ,
आज बहुत खुशनुमा सा है ।
शायद इन्हें खबर थी ,
तेरे आने की ।
गिरा दो चिलमन अपने चेहरे पर ,
कही बहारों की नज़र न लग जाए ।
आ बैठ मेरे पास ,
ऐसा कोई समा बनाये ।
वर्षों से है प्यासा ये मन ,
प्रेम रस थोड़ा नीर बहाएं ।
बुझे हुए मन में हम अपने ,
प्रेम का कोई दीप जलायें ।
बने याद कोई ऐसी की ,
ये मन कभी न बुझाने पाए ।
आ बैठ पास मेरे,
ऐसा कोई समा बनाये ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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