कुछ घाव जिंदगी के भरे ,
कुछ खुले पीड़ा सहने को ।
कुछ हर्ष लिए ,
कुछ खट्टे-मीठे , एहसास जिंदगी के ।
लालसा लिए वो ,
जिसका न रहा मुकद्दर ,
है दर्द यही ।
क्यों तृष्णा में मन बने मृग ,
कदाचित हो भाग्य यही ।
दुख-सुख अनुभूति हृदय का ,
हृदय ही शत्रु -मित्र है जीवन का ।
अंकुश लगे इस पर जो ,
न करे ये फिर अपनी मनमानी ।
बना फिर क्यों न रहे ,
संतुलन जीवन का ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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