सोचता हूँ के
वो मुकद्दस रात , कैसी होगी ?
होंगे रूबरू ,
जब हम उनके ।
वो फूलों की सेज़ पर ,
घूंघट में बैठी होगी ।
हल्के से जब मैं ,
उसका , उठाऊं घूंघट।
सोचता हूँ के
वो मुकद्दस रात , कैसी होगी ?
होगी उनकी , नज़र मेरे चेहरे पर।
मेरे दिल के ,
धड़कने की ,
रफ्तार फिर ,क्या होगी ?
होंगी सरगोशियां ,
कुछ करीब हो कर ।
झिझक शायद फिर ,
कुछ कम तो होगी ।
सोचता हूँ के
वो मुकद्दस रात ,कैसी होगी ?
✍ज्योतिप्रसाद
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