हम अभी भी है उसी रहगुजर में ,
राहें वो ही अपनी हमसे जुदा कर गए ।
कहते थे जो हमसे कभी कि हम ,
मुस्कुराते हुए अच्छे लगते है।
वो ही आज हमें तन्हां ,छोड़ कर चले गए।
देखा न दर्द उसने ,मेरी हंसी में जो छुपा था।
हर किसी से ठुकराए गए हम ,
और आंसुओ के घूट हम पी गए।
वफ़ा क्या जिंदगी ,
दर्द ए दिल का सकून ही अब ,
मेरी तन्हाईयाँ है।
खुश हूँ मैं बहुत , अपनी उदासियों में रहकर।
दिख रहा है , आज उनका बेनकाब होकर।
✍ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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