हाँ सब खैरियत से है , बस यूँही ।
कभी डूब जाता हूँ , ख्यालों में अक्सर ।
कि सच महंगा है या , झूठी शान वो सौकत ।
दिल की बात , करते भी है कई ।
मगर बड़ा दिल तो , रखो तो सही ।
माना कि बहुत है इक चिंगारी ही , अंधेरों को चीरने के लिए ।
मगर उस चिंगारी को दिल में , दबा कर रखो तो सही ।
हार भी जरूरी है , सबक हासिल के लिए ।
फिर जीतने के लिए वो सबक , याद रखो तो सही ।
टिमटिमाते है वो ही दीये , जो जला करते थे कभी ,
अपनी रावनियों में ।
जल तो रहे है वो अब भी , किसी तरह बस इतना ,
काफी ही सही ।
हर शुरू का छोड़ , आखरी भी तो है ।
वो अनन्त हो , तो क्या बुरा ।
ढूंढ ही लेंगे उस , छोड़ को मगर ।
यह बेला दुःख की , कट जाए तो सही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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