वो दिन कभी न आए ,
के तुम हमसे रूठ जाए ।
होगी वो घड़ी आखरी जीवन की ,
जो ये दिल तुझे कभी भूल जाए ।
लो चले अब ख्वाबों के शहर ,
शायद कोई ख्वाब पूरा हो जाए ।
राह ए मंज़िल , मिले या न मिले ।
पा ही लेंगे , मंज़िल को हम ।
बस मंज़िल का , पता हासिल हो जाए ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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