धधक रही है ज्वाला जी में,
अश्रु बने अंगारे है ।
उठो वीर अब लांघ चुके वो ,
अपनी सीमा सारी ।
ध्वज केसरी , अस्त्र-शस्त्र हाथ में ।
धर्म रक्षण की ।
अब कर लो , तुम तैयारी ।
जयघोष शंख पांच मुखी को तुम ।
गुंजा दो अब ।
कूचे कूचे , हर गलियारों में ।
बहुत खेल लिए वो ,
खेल रक्त रंजित का ।
पूरी हो गयी सीमा अब ,
सहन की सारी ।
उठो जागो ! चिरनिंद्रा से ।
महासंग्राम की अब ,
कर लो तुम तैयारी ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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