क्यों ख़यालों में ,बस गए है वो इतना ।
के उन्हें भुलाने की ,तमाम कोशिशें भी ,
नाकाम हो गईं है ।
रग रग में है समाये वो ,
ख़्वावो में भी वो ही है अक्सर ।
इक तरफा ही है यह इश्क मेरा ,
जिएंगे जब तलक ।
रहेंगे उन्हीं के ही यार बन कर ,
सांसों की आखरी रफ्तार तलक ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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