कुछ हालात ही बन गए है इस कदर ,
कि हम अब उनसे कुछ कह नही सकते ।
भूल भी कैसे जाएं हम उन्हें ,
दिल ए फिरदौस ए गुल वही तो है ,
ये भी हम उनसे कह नही सकते ।
कल ही कि बात है अभी तो ,
नज़रअंदाज़ हुए हम ।
शायद यह आगाज हो ,
खिंज़ा ए बाहर का मोहब्बत के,
इस गुलिस्तां में ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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