यूँ ही नम हो चली थी , ये आंखे ।
कुछ पुरानी यादें लिए ।
उमड़ पड़े , बादल मेरे दिल के ।
रिमझिम सी फुआर लिए ।
बदल गए है , मायने रिश्तों के ।
वक्त की गर्त में , हो कर दफन कहीं ।
ढूंढ रहा हूँ , बेबस हो कर ।
मिल जाये वो चिराग मेरी ,
मोहब्बत का कहीं ।
यूँ तो खिंज़ा ही रही है,
इस दिल के दामन में ,
ने आना तो ,
कब का ही , छोड़ दिया है ।
मगर इक आश है ,
बची हुई जो सीने में ,
उसी से दिल लगाना ,
अब हमने , सिख लिया है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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