तू मेरी प्रेरणा बनकर , मेरे गीतों में ढली ।
बनकर तू कोयल , मेरी वाणी में पली ।
पाँवों बनकर तू मयूर , मेरे नृत्य में ढली ।
राधा बनकर तू मुझे निहारे ,मन तेरे छवि किशन की बनी ।
बनी चाहत पक्षी चातक जैसी , तज्यो प्राण संग मन में ठनी ।
अमर प्रेम यह जीवन का , बर्षो से यह रीत चली ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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