आशाओं की इक , किरण दिखी है ।
उस किरण का , तेज बन जाना तुम ।
उनकी सांसों में बन ,
सुगंध मधुबन की ।
सदा महकते रहना तुम ।।
बसा ले वो तुम्हें , अपने मन-जीवन में ।
बदरा बनकर , प्रीत बरसाते रहना तुम ।
तरुणाई बन , उन कलियों में छा जाना तुम ।
मन आंगन का श्रृंगार बन यूँ तुम,
प्रफुलित हो उठे जो उसका मन ।
नैनों की "ज्योति" बन कर ,
सुलभ राह दिख लाना तुम ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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