बहुत मुश्किल है इस जहां में ,
ऐसा कोई मिलना ।
जो दर्द कोई बांट सके ।।
नज़र गाड़े हुए है ,लोग यहां ,
जख्म देने को ।
यह झूठ का पुलिंदा है साहिब !
नही कोई साथी सच यहां ।
चार दिन रहेगी मुलाकात ,
फिर तू कहाँ और वो कहाँ ।
न उम्मीद कर किसी से के कोई ,
हमसफ़सर बन जायेगा यहां ।
फरेब ही फरेब है चारों तरफ ,
और नकाब पोश में है चेहरे यहां ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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