बहुत तरसा है ये मन ,
एक तेरी झलक पाने को ।
तू डाली सी गुलाब की ,
हवा के झोकों से ।
इठलाती बलखाती ,
मस्त झूमती सी ।
चमन में महक अपनी,
बिखराये हुए ।
तू भवरों की महफ़िल ,
सजाये हुए ।
मैं पतंगा , देखता ही रहा ।
अरमानों की , दुनिया सजाए हुए ।
अब नही है चाह , कुछ पाने की
तेरे सिवा ।
हम हो बजूद में या न हो ,
तेरे कभी ।
तेरा बजूद रहे मुझमे ,
खुदा से है बस इतनी सी दुआ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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