मुहब्बत मिली भी थी ,
और खत्म भी हो गयी ।
बस , अब तो यादों के सैलाब बाकी है ,
आंखों के समंदर में ।
उनकी जफ़ाओं से हैरान नही हूँ
मैं ,
मेरी वफाओं में कमी क्या रही
होगी ?
इसलिए थोड़ा परेशान हूँ मैं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
मुहब्बत मिली भी थी ,
और खत्म भी हो गयी ।
बस , अब तो यादों के सैलाब बाकी है ,
आंखों के समंदर में ।
उनकी जफ़ाओं से हैरान नही हूँ
मैं ,
मेरी वफाओं में कमी क्या रही
होगी ?
इसलिए थोड़ा परेशान हूँ मैं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें