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आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया

आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया । 
वो पहली मुलाकात , वो तेरी झुकी हुई निगाहें । वो तेरे सवालात के दिन , याद आया । 
आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया । 
मुझसे न सह जाना , कि तू करे गुफ्तगू किसी और से ! 
कही छोड़ न दे तू मेरा साथ , इस बात से मेरा घबरा जाना । 
और तकरार की आग में , दोनों का झुलस जाना । वो हमारे कदम दर कदम , मोहब्बत में बढ़ जाना । 
और धीरे तेरा , मेरे दिल मे बस जाना । 
रोया कभी मैं तो कभी तू , अपने हाल ए दिल बयाँ करके । 
मैने तो इस जहां में , अनमोल हमसफ़र तुझे पाया । 
मैंने जो तेरी आँखों में , इक नूर मोहब्बत की देखी । 
उस नूर को मेरा पा जाना , आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया । 
मालूम नही था के ऐ मेरे जान ए जहां , खुद को खो कर हासिल तेरी मोहब्बत होगी । 
खोया है बहुत , तन्हां ए शाम ए गम में । 
हासिल है जो अब सकून ए बहार मुझ को , 
ऐ सनम मैंने तेरे दिल से ही पाया । 
आज फिर वही दास्तान ए इश्क , मुझे याद आया । 
वो तेरा शर्म से , पलकों का झुका ना । 
और नज़रों को तेरा , धीरे से उठा जाना । 
वो तेरी सरारत से भरी निगाहें , और मुझ को तेरा मुँह चिढाना । 
पल में तेरा ख़फ़ा होकर आँसू बहाना , मेरा तुझको मानना , तेरा फिर से मुश्कुराना । 
आज फिर वही दास्तां ए इश्क , मुझे याद आया ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

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