जिधर भी देखता हूँ , तू ही तू नज़र आये ।
सोचता कुछ और हूँ , मगर ख्याल तेरा ही आये ।
अब क्या क्या , बयाँ करूं मैं हाल ए इश्क ।
दीवानगी की बे-इंतेहा हो गयी है ,
हुए हम मयकश के तुझे भूल जाएं ।
सोहबत ए महकशी तुम्हारी ही रही
ख्याल बनकर ।
जाम ए शराब में हमें , तू ही नज़र आये ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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