इजहार ऐ मोहब्बत, हमें करना न आया ।
उन्हें ही देखते ही , रहे नज़र भर ।।
न लव खुले, कुछ कहने को ।
न नज़र हटी, चेहरे से ।
थी ये इक मेरे , ख्यालों की दुनिया ।
लौट कर जब हम ,वापस आये तो ।
खुद को हमने , यहाँ तन्हा पाया ।।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
इजहार ऐ मोहब्बत, हमें करना न आया ।
उन्हें ही देखते ही , रहे नज़र भर ।।
न लव खुले, कुछ कहने को ।
न नज़र हटी, चेहरे से ।
थी ये इक मेरे , ख्यालों की दुनिया ।
लौट कर जब हम ,वापस आये तो ।
खुद को हमने , यहाँ तन्हा पाया ।।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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