गुम-शूम गुम-शूम सी है ,
आज जिंदगी ।
न आये वो ,
न पहगाम ही कोई ।
चित है व्याकुल ,
और मैं हूँ खोई खोई ।
नज़र एक घड़ी भी क्या ?
मजाल है जो ,
हट जाए उस राह से ।
जिस राह से आना-जाना था ,
उसका रोज-रोज ।
मगर न जाने क्या हुआ ?
वो क्यों न आये इस ओर ।
चित है व्याकुल ,
और मैं हूँ खोई खोई ।
हर आहट पर चौंक जाती हूँ ,
कहीं होंगे वो ही शायद ।
दौड़ी चली जाती हूँ ,
बे-सुध होकर ।
गुम-शूम गुम-शूम सी है ,
आज जिंदगी ।
न आये वो ,
न पहगाम ही कोई ।
चित है व्याकुल ,
और मैं हूँ खोई खोई ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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