हमारे प्यार की कश्ती , न हो पार कभी ।
मज़ा जो चलने का ,धाराओं में है ।
वो साहिल , मिल जाने में कहां ।
न मंज़िल का , पता मिले ।
न सफर खत्म हो , ये कभी ।
बिखर जाते है ,मुसाफिर अक्सर ।
मंज़िलों के आते ही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
हमारे प्यार की कश्ती , न हो पार कभी ।
मज़ा जो चलने का ,धाराओं में है ।
वो साहिल , मिल जाने में कहां ।
न मंज़िल का , पता मिले ।
न सफर खत्म हो , ये कभी ।
बिखर जाते है ,मुसाफिर अक्सर ।
मंज़िलों के आते ही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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