कैसे कहें मेरा हर लम्हां ,
किस कदर गुजरा तेरे बगैर ।
सूनी है गालियां यहां दिल की ,
सूना है शहर - शहर ।
अहा भी भरी और ,
दिल को भी थाम लिया ।
रूठ भी लिए खुद से ,
और खुद को मना भी लिया ।
खुद को जी भी लिया ,
और खुद को मार भी लिया ।
इसी तरह से तन्हां जी ,
गुजर हमने कर लिया ।
अहा भी भारी और ,
दिल को थाम भी लिया ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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