शीसा होता तो यह दिल मेरा , चटक कर बिखर जाता ।
होती आवाज़ टूटकर , बिखर जाने की ।
सबको होती खबर , कुछ रोते कुछ हंसते जी भर कर ।
मगर यह दिल मेरा , शीसा ही तो न हुआ ।
टूट कर बिखरा तो सही , मगर ।
किसी को न हुई , कोई खबर , इसके टूट , जाने की ।
घुट घुट कर ही जीता रहा ,गम ए अश्क अपने पीता ही रहा ।
कोई पहचान न ले दर्द इसका , खुद मर मर कर जीता ही रहा मगर ।
किरदार हँसने-हँसाने का ,यह अपना निभाता ही रहा ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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