अविस्मयी , शुभ दिवस
आया है आज ।
मिला था मैं अपनी स्वप्न
सुंदरी से आज ।
आलिंगन हुए थे हम ,
मन प्रफुल्लित हुआ था ।
हृदय आज तक हर्षित है ,
लिए छवि अनोखी ।
प्रेम पाश में बंधी हुई ,
निर्मल निश्छल ।
कई उतार चढ़ाव आये ,
मध्य में हमारे ।
किन्तु अपनेपन की रही ,
अनुभूति ।
अद्भुत अटल निश्छल ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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