कैसे न फिक्र हो , आपकी ।
तुम ही तो खुशी बनकर , आये हो ।
इस उदास दिल की , मेरे ।
दिल की बहारों में ,
खिजां का आलम ही था मेरे ।
खिलाया है इसमें गुल कोई ,
मोहब्बत का आपने ।
कैसे भूल सकता है ये दिल ,
वो राहें गम की ।
भटक गया था ,
जिसमें यह दिल कभी ।
संभाला है जो इसे तुमने ,
अपनी प्यार की छांव में ।
दिल ने चाह है तुम्हें ,
दिल पर हमारा जोर नही ।
रहे न फिक्र में ये कभी आपकी ,
ऐसा जीते जी कभी होगा नही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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