लुटी लुटी सी हूँ आज , ऐ इश्क ! काश तू न होता ।
बड़ी मस्त उड़ान थी मेरे दिल की , ख्वाबों के "शहर" ।
थकी थकी सी हूँ आज , ऐ इश्क ! काश तू न होता ।
हसरत लिए रखे थे कदम , शहर ए मोहब्बत में ।
न मोहब्बत ही हासिल हुई , न दिल की आरज़ू ही ।
रुके रुके से है आज कदम , ऐ इश्क ! काश तू न होता ।
गम साहिल जो बना मेरा , एहसास ए दर्द ही अब ।
आती है जब यादों में , वो तेरी फरेबी नज़र ।
झुकी झुकी सी है आज नज़र , ऐ इश्क काश तू न होता ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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