इक ख्वाब देखा था के ,
बने नाशिबों में मेरे आप ।
लो बन गयी तकदीर के ,
मिल गए हो जो आप ।
एक ख्वाब देखा था के ,
मेरे गुलज़ार में महके गुल ,
कोई आप सा ।
मेरे दिल के चमन में , अब तलक ।
न कोई गुल महका , आपसा ।
खुश नसीबी , नही तो और क्या है ?
जो मेरे दिल ए गुल , बन गए हो आप ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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