कोई अजनबी आया है , दिल की इस महफ़िल में ।
ऐ जिंदगी ठहर तो ज़रा कोई गीत , गुनगुना तो लूँ ।
बर्षों से यही आरजू थी के , दिल का कोई महबूब मिले ।
शुक्र है आपका के , आप हमको क्या मिले ।
के बन गया है मुकद्दर , और जीने तमन्ना जाग उठी ।
बुझते हुए चिरागों की , रोशनी जाग उठी ।
मुरझा गया था जो इश्क , खिज़ा की वादियों में ।
तेरे हुश्न की जवां शौक़ अदाओ से , जीने की उमंग जाग उठी ।
ज़रा ठहर तो जाओ अश्कों , अपने अँखियों के झरोखों में ।
वर्षों से मिला है महबूब दिल का , जी भर उन्हें देख तो लूँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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