सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आरक्षण औषधि रूप में कर गयी काम ,व्याधि अब स्वस्थ हो गए ।

आरक्षण औषधि रूप में कर गयी काम ,
व्याधि अब स्वस्थ हो गए ।
अब तो विषाक्त हुआ जा रहा है ये ,
सनातन समाज में विखंडन का ।
कारक बनता जा रहा है ये ।
अभी तक सरकार नही कर रही ,
खत्म आरक्षण ।
बस यही तो रोना है , हम कोशिश पर है की जातिवाद खत्म हो ।
मगर क्या करें व्यवस्था में ही खोट बड़ा है ।
कैसे बने सनातनी एक , अभी भी हर के दिलों में ।
हरिजन दलित पिछड़ा स्वर्ण का विखंडन तुला ,
खूंटा गाड़े खड़ा है ।
 प्रभु ! तुम ही करो ,अब कोई जतन ।
करो कोई चमत्कार ,हो जाएं जो हर एक ।
सनातनी एक जुट ,करो हृदय परिवर्तन ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वो कोई अब नहीं पूछता हाल ए दिल..

वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से । थोड़ा आ ऐ जिंदगी ! संग मेरे , तू भी सुस्ता ले । रहा है साथ तेरा जन्म से , और रहेगा मरण तक । सफर लम्बा रहा है , अब तलक । न जाने आगे रहेगा साथ , कब तलक । आ बैठ पास उर से निकल , पढ़ तो ! प्रभु ने भाग्य लेख में मेरे , क्या क्या रचना रची है । ढल गया हूं जिस्म से , देख तो । मेरे चेहरे पर चमक , कितनी बची है? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी"मलंग"

हाँ माँ सच तुम होती जो संग हमारे ।

 हाँ माँ मैने खाया आम कच्चा , मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । एक आने के लिए फाल्से, दिए बाबा ने केवल चार । तुम भी होती संग नानी के , खाती तुम भी आम का अचार । नाना ने गाड़ी में बिठाया , मेला सारा हमें घुमाया । इक अन्नी का बजा मुझे , मुन्ना को गुब्बारा दिलवाया । नाना ने फिर टपरी में जाकर , चाय पकौड़ी और नमकीन खिलवाया । हाँ माँ ! सच तुम होती जो संग हमारे , चरखी , झूला , नाच कठपुतली का देख कर संग में बजाते ताली । शोर-शराबा कहीं हाथी भालू , नाच रही थी बंदरिया मतवाली । हाँ माँ मैंने खाया आम कच्चा ,मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी