माना नहीं है अब ।
हमारे बीच मोहब्बत में.......ये सब ।
एहसास गम ओ खुशी का वो अपनापन ,
वो शिकायतें , रूठना माना , दिल की बेकरारी ।
तो फिर क्यों मेरे ख़यालों में रहती है ....वो अब ।
कहीं दिल के किसी कोने में ,
कोई चिंगारी मोहब्बत की दबी तो नही ।
न न ऐसा तो नही , तो फिर क्यों ?
इंतज़ार रहता है , के दिखे वो इक नज़र....कहीं ।
क्यों ख्वाबों में रहती है वो मेरे अब भी ,
बनकर मेरी मोहब्बत ।
हाँ यह दिल उन्हें अभी शायद ......भूला नहीं ।
कहाँ आसान होता है भूल जाना किसी को ,
जो रोम रोम में बसा हो ।
जुदा हो गयी है राहें , अब हमारी ।
उनकी वो जाने ।
मगर मैं उन्हें अभी तक.......भूला नही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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