मेरी खामोशी का ये हुआ असर ,
सब गुजर गए ,
थे जो मेरे अगल बगल ।
न तनाव है न कोई उलझन ,
दिखावा ही सही ,
मगर शांत है मन ।
अब झंझट तो नही ,
के मैं बोलू किसी को कुछ ।
और वो समझे कुछ ।
शांत है मौहाल मेरे अंदर ,
बाहर कलरव हो तो हो ।
मेरे कारण तो नही है ,
मैं तो खामोश हूँ ।
किन्तु इक टीश सी है ,
हो अन्याय और रहूँ खामोश ।
क्या होगा सार्थक ,
पक्षधर मेरी खामोशी का ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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