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मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ।

मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ?

दिल से निकलते ही नही कोई और  ज़ज़्बात , न  ख़यालात सिवा गम के ।

मेरे गमशुदा दिल के एहसास भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ?

मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ?

 लिखती है कलम दिल की ही , जो महसूस करती है जमाने में ।

कुछ आपबीती कुछ किसी के गम की , करती है बयाँ हाल ए गम , मेरी नज़्म वो ग़ज़ल ।

 मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ?

लुटे हो दिल के आशियानों से चैन जिनके ,जो दर्द की आगोश में खुद को समेटे हुए हो ।

अश्कों के निशां बयाँ करती हो , गम ए दास्ताँ जिनके रुख्सारों पर ।

लिखेगा कैसे दिल भला , नगमा कोई खुशी का ।

अपनी लुटती हुई , बहारों पर ।

मेरे गमशुदा दिल के एहसास भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ?

मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ?

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 





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