आज कल करते करते ,
बीत गए हो मानों बर्षो जैसे ।
सच कहो कब आओगे तुम ,
ओ साजन मोरे ।
प्यासे हैं मोरे प्राण पखेरू ,
तेरी प्रीत जल को तरसे है ।
तरस रही है आंखे ,
दरश को तोरे ।
झर झर , नीर बरसे है ।
दिवस न भाता ,
अब न रात सुहाती ।
विरह की अग्नि मोहे ,
हर रोज जलती ।
आजा साजन ,
बनकर तुम सावन ।
प्रीत नीर बरसाओ जी ।
बुझे ये अग्नि ,
विरह मोरे मन की ।
आकर ,
आलिंगन लगाओ जी ।
नही रहा जाता , अब तोरे बिन ।
झट अब आ जाओ जी ।
✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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