न जाने आज कल वो , ख्वाब क्यों नही आते ।
रहते थे जिनके सहारे , हम दिन रात ।
न जाने वो रात-दिन , अब क्यों नहीं आते ।
ऐसा नही के वो ,
नही आते मेरे ।
दिल-ए-बज़्म में ।
मगर रहते है , वो खामोश ।
न जाने क्यों ?
पहले की तरह , कोई सरगम ।
अब नही गुनगुनाते ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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