न जीने देगी मुझे , न मरने देगी मुझे ।
मिला है जो तोफा मुझे , तेरी फुरकत का ।
न अब वो नज़ाकत ही रही , और न अब कोई उमंग ही रही ।
अच्छा सिला दिया है तुमने , मुझे मेरी उलफत का ।
जल रहा हूँ मैं अब , समा तेरी बज़्म में ।
बुझते हुए , चिरागों की तरह ।
ये मेरे नज़्म मेरे गीत , आखरी हो अब शायद ।
जीने की अब कोई , हसरत बाकी कहाँ ।
जी रहा हूँ मैं , मगर गुनाहगारों की तरह ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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