अलविदा कहना ,
अब बेहतर होगा ।
तेरी इस , महफ़िल से ।
बड़े अरमान लिए ,
आये थे हम ।
तेरी इस , महफ़िल में ।
के सुना सकूं मैं तुम्हें ,
अपना हाल ए दिल ।
तेरी इस, महफ़िल में ।
जो ढली है मेरी जिंदगी में ,
दर्द ए ग़ज़ल बनकर ।
तुम जो सुन सको हमारी ग़ज़ल ,
तुम्हें इतनी फुरसत कहाँ ।
बहुत हुआ अब , इंतज़ार ए नज़र ।
तुम देख सको , हमें इक नज़र ।
तुम्हें इतनी , फुरसत कहाँ ।
बेहतर है तेरी महफ़िल से अब,
लौट कर जाना हमारा ।
रहो तुम सलामत , हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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