न जाने क्या ढूंढती है ? ये आंखें इधर उधर ।
न जाने किसकी ? तलाश है इन्हें ,
न जाने किसे ढूंढे जा रही है ।
पूछ तो लेती इक बार दिल से ,
क्या एहसास लिए हुए हो ?
उम्मीद की किरण कुछ है ? तो कहो ।
शबनम को समेटे हुए अपने , बे-सुध ढूंढे जा रही है ।
न मालूम शायद , दिल ने कुछ कहा हो इसे ।
रात भर जागती जा रही है ।
न जाने क्यों खोई खोई सी है ? इक टक लिए ।
आसमाँ को निहारते जा रही है ।
न जाने क्यों? होती भोर कुछ बदली हुई सी ।
हर दम खुद में सिमटे जा रही है ।
दिल की है यह संगनी शायद , तभी तो राज़ ए हकीकत छुपाये जा रही है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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