जख्मों से सुलह कर ली अब ,
दर्द ए एहसास तो नही ।
हाँ कभी कभी कुरेद कर ,
देख लेता हूँ ।
ज़ख्म ए दिल ,
कही ये उन्हें भूला तो नही ।
रश्क क्यों हो अब मुझे ,
उनकी महफ़िल से ।
बड़ी मदहोश है अब ,
मेरी तन्हाई भी ।
दिल ए फिरदौस में अब ,
बहारें न सही ।
गुजर अभी भी है ,
उस तरफ ।
हवाओं का आना अभी ,
रुका तो नही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें