लो दे चुकी है दस्तक "क्रांति"
सनातनी अब जाग उठे ।
मच गयी हलचल चारों "ओर"
सनातनी अब जाग उठे ।
हो रहा है वहिष्कार अब , हर "उसका"
जो करे अपमान , धर्म सनातन का ।
अभी अनुसरण है शांति पथ का ,
अब धैर्य सीमित है , काल अस्पष्ट है ।
मत करना विवश ,
संभल जाओ अब "तथाकथित"
ज्ञात नही कब उठ जाए ,
अस्त्र-शस्त्र महाकाल का ।
हर अत्याचार का , प्रतिशोध लेंगे अब ।
अब अपना खोया हुआ , स्वाभिमान वापस लाएंगे ।
लेकर रहेंगे उनसे हर वो , सब कुछ अपना ।
जिस पर बल- छल से , किया उन्होंने अधिकार अपना ।
मिटा देंगे हर वो चिन्ह ही , जो प्रमाणित करे ।
सनातन पर हुए , अत्याचार का ।
दम भरते हो जिन , धर्म-द्रोहियों के कारण ।
उनसे भी अब , बंदर नृत्य करवाएंगे ।
है गंगा भी हमारी , जमुना भी हमारी है ।
सहस्र शताब्दियों से , फलित है ,
यहाँ सनातन "संस्कृति" हमारी है ।
बन्द करो अब स्वाग , झूठे भाई चारे का ।
सच मे उन्होंने कब , भाई चारा निभाया है ।
लिए मंशा कत्ल की हर दम ,
काफिर करके हमें सदा बुलाया है ।
अब उनके झाँसे में हम ,
कतई नही है "आने वाले" ।
समझ गए है छल कपट , सब
अब न धोखा खाएंगे ।
उनकी चालों से ही अब उनको ,
मात दे जाएंगे ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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