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बस अब और नही देखा जाता मुझसे , दुख मेरे महबूब का ।

बस अब और नही देखा जाता मुझसे , दुख मेरे महबूब का । 

उनकी  खामोशी पर तो रहम कर मेरे प्रभु । 
भूल क्या ये थी मेरी कि , मैंने तेरे दर से । 

अपने लिये कभी कुछ मांगा नही । 
गर यह भूल थी तो ,अब मांग लेता हूँ ।

मेरे महबूब को दुरस्त कर , 
या फिर मुझे इस जहां से रुख्सत कर । 

उनके हसीं चेहरे का वो नूर लोटा दे मेरे प्रभु । उनकी वो जवाँ हसरत , वो आरजू दिल ए सकून लौटा दो मेरे प्रभु । 

उनका खिलखिला कर हँसना , कभी रूठना , कभी मनाना ।

वो प्यार से भरी निगाहे उनकी , वो घटाओं सी जुल्फ , वो अल्हड़पन उनका ।

वो नाजों से भरा रूप और वो शर्मिला अंदाज़ उनका ।

यही सब तो था गहना उनका , उनका यह सब गहना लौटा दो मेरे भगवन ! 

बहुत सहा है गम उसने , तन मन से वो दुःखी बहुत है । 

नही किया है उसने बुरा कभी किसी का , दिल मे सबकी खातिर दया बहुत है । 

सुन ले मेरी विनती तू प्रभु , मुझसे नही देखा जाता अब दुःख उसका । 

बहुत सहा है दर्द उसने जीवन भर ,
करो दूर अब हे कृपानिधान ! दुख उसका ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

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