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हर वो राह अपनी ही भली लगती है ,

हर वो राह अपनी ही भली लगती है ,

बाल-काल बीता हो जहाँ ।

उबड़ खाबड़ , पथरीले टेढ़े मेढ़े , 

भले हो वो राह मरु-कंटीले ।


हर वो अपना पनघट सूंदर लगता है ।

बुझी हो प्यास जहां बचपन की

नदी तालाब कुआँ पोखर ,

पहाड़ पर्वत के वो शीतल झरने ।


हर वो गलियां भली लगती है , 

नन्हे पग चले हो जहां ।

इठलाते , मचलाते , मस्ती में झूमते गाते ,

भले हो वो गलियों वो नुक्कड़ पत्थरीले ।


अपना ही गाँव या शहर भला लगता है ।

जिसकी की गोद में पले बड़े हुए ,

माँ बाबा दादा दादी , भाई बहनों के संग ।

याद बहुत आता है अपना वो , 

छोटा सा प्यारा सा घर आंगन। 

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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